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Sun In Astrology

Jan 2

9 min read

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सूर्य के विषय में हमने ज्योतिष के माध्यम से बहुत कुछ समझने का प्रयास किया, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है की कितना कुछ अभी समझना बाकी है। आज मैं आपको सूर्य के विषय में कालपुरुष को ध्यान में रखते हुए कुछ बताने का प्रयास कर रही हूँ, उम्मीद है आपको पसंद आएगा और ग्रहों को समझने का हमारा दृष्टीकोण शायद एक नया मोड़ ले। सबसे पहले आप सभी को मेरी तरफ से नववर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! 



जब उदय होता है तब रात्रि का अन्धकार दूर होकर सारी सृष्टि की दिनचर्या शुरू हो जाती है, ये हमे सूर्य की विशालता का संकेत देता है। 

सूर्य की विशालता को सबसे पहले पद्य (कविता) के माध्यम से समझते है। 


बिन बोले बोल जाना ऐसी अद्भुत कला हूँ मैं। 

ख़ामोशी में छिपा जीवन का तजुर्बा हूँ मैं।।


प्रेम में स्थिरता का भाव हूँ मैं।

जीवन में संघर्षों का अभाव हूँ मैं।।


सबसे गहन मित्र हूँ मैं।

आपकी आत्मा का चरित्र हूँ मैं।।


कर्म का रुपान्तरण हूँ मैं।

सफल जीवन का कारण हूँ मैं।।


शरणदाता हूँ मैं।

आपका भागयविधाता हूँ मैं।।


एक सकारात्मक दृष्टिकोण हूं मैं।

इसलिए मान और सम्मान हूँ मैं।।


आपके नेत्र हूँ मैं

बंद आँखो से भी दिखे ऐसा क्षेत्र हूँ मैं।।


बादलों को चीर कर निकली धुप हूँ मैं। 

आपका सबसे सूंदर रूप हूँ मैं।।


नींद का संघर्ष हूँ मैं। 

नित्य दिया गया परामर्श हूँ मैं।। 


पूर्वार्जित कर्म हूँ मैं।

जीवन का सबसे बड़ा धर्म हूँ मैं।।


सभी इन्द्रियों का स्वामी हूँ मैं।

तभी तो परमज्ञानी हूँ मैं।।


जीवन का गहरा सागर हूँ मैं।

ज्ञान के लिए किया गया कर्म हूँ मैं।। 


व्याख्या -


बिन बोले बोल जाना ऐसी अद्भुत कला हूँ मैं। 

ख़ामोशी में छिपा जीवन का तजुर्बा हूँ मैं


समझदारी और गंभीरता आपके शब्दों से व्यक्त होती है। यही गंभीरता और समझदारी आपके कहे गए शब्दों को वजन देती है। कई बार तो ऐसा होता है कि कोई बिलकुल भी नहीं बोलता जैसे कि ऋषि-मुनि या योगी आदि लेकिन फिर भी उनका आभा-मंडल और बिना बोले ही बहुत कुछ बोल जाने का प्रभाव चारों तरफ छोड़ देता है। 


ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य की सिंह राशि एक स्थिर राशि है। इसलिए कुछ लोगों की आँखों के डर से ही सारे काम बन जाते है। भले ही हमारे बुजुर्ग पढ़े-लिखे उतने न हों या वर्त्तमान तकनीक का इस्तेमाल न जानते हों लेकिन जीवन का तजुर्बा है उनके पास, तभी तो वो आज भी इतने खुश हैं और हम और आप सब कुछ होते हुए भी नाखुश है। कालपुरुष में दुसरे स्थान से वाणी की बात होती है लेकिन वाणी का सुख पंचम स्थान बताता है और पंचम स्थान में सूर्य की सिंह राशि स्थित है जो अग्नि तत्व के साथ-साथ स्थिर राशि भी है। वाणी के सुख स्थान में स्थिर राशि वाणी में स्थिरता और गंभीरता को दर्शाती है और अग्नि तत्व राशि वाणी के प्रभाव को दर्शाती है।


गीता के 17 अध्याय के 16 वें श्लोक में कहा गया है-


मनः प्रसादः सौम्यत्वम् मौनमात्माविनिग्रहः।

भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो  मानसमुच्यते।।


विचारों की शांति, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम तथा उद्देश्य की पवित्रता ये सभी मन की तपस्या कही गयी हैं।इसीलिए वर्त्तमान समय में मौन को ध्यान के माध्यम से कुछ समय काल के लिए कराया जाता है। अगर व्यर्थ में बोलने की आदत को हम बदल लें तो जीवन की कितनी समस्याओं का समाधान हमे स्वयं ही मिल जाएगा। कालपुरुष में दुसरे और पंचम में स्थिर राशि देने का यही तात्पर्य है कितना भी क्रोध हो संयम से ही अपने आप को प्रकट करें क्योंकि कहे हुए शब्द वापस नहीं हो सकते। 


पंचम भाव से विचारों की बात होती है और विचारों से शब्द भी बनते है, जैसा आप सोचोगे वैसा ही आप बोलोगे।ध्यान से सोचो और फिर बोलो यही तो हमारे बड़े हमेशा से कहते आये है। विचारों की बात पंचम भाव से की जाती है और कालपुरुष में पंचम में सूर्य की सिंह राशि स्थित है। विचारों में दृढ़ता और स्थिरता से व्याख्यान शक्ति स्पष्ट होती है अगर आपकी सोच साकारात्मक है तो वाणी भी साकारात्मक ही होगी। 


सूर्य को राजा क्यों कहा गया और क्यों हम राजा की बात मानते है, क्यों उसकी वाणी में इतना प्रभाव होता है कि एक शब्द एक बड़ा निर्णय बन जाता है, क्योंकि वहां विचारों में स्थिरता है, विचार अगर स्थिर है तो मन शांत रहेगा और इसका प्रभाव सीधा वाणी पर होगा। 


प्रेम में स्थिरता का भाव हूँ मैं।

जीवन में संघर्षों का अभाव हूँ मैं।।


पंचम भाव से प्रेम की बात होती है। प्रेम एक शब्द मात्र नहीं है बल्कि एक एहसास है जिसे आत्मा से महसूस किया जा सकता है। हम वर्त्तमान युग में सिर्फ इस भाव को केवल प्रेम विवाह के रूप में मात्र देखते है लेकिन ये इससे कहीं अधिक है पर शायद कभी इस विषय में सोचा ही नहीं गया। प्रेम एक भावना नहीं है, बल्कि आत्मा की गहरी और शुद्ध अभिव्यक्ति है।

सप्तम भाव से दैनिक दिनचर्या की बात करते हैं और पंचम भाव सप्तम भाव से गणना करने पर एकादश होता है यानि सप्तम की वृद्धि बताता है।


पंचम भाव अर्थात प्रेम और तन्मयता से अगर सभी कार्य किये जाए तो रोज-मर्रा का जीवन भी कितना सुन्दर होगा। अगर आप ईश्वर से गहरा यानि आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं तो सभी से प्रेम करें क्योंकि ईश्वर उसी के हृदय में निवास करता है जो सभी प्राणियों से समान प्रेम करता है। सम्मान की बात सूर्य से होती है और सूर्य को कालपुरुष में पंचम का स्वामित्व प्राप्त है। पंचम भाव प्रेम भी बताता है, प्रेम ऐसा जिसमे सम्मान भी हो। 


सिंह राशि स्वतंत्र विचारों की राशि होती है जो विचारों की स्वतंत्रता का विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग को भी बताती है। प्रेम में भी स्वतंत्र होनी चाहिए। वर्त्तमान युग में प्रेम विवाह टूटने का सबसे बड़ा कारण यही है कि दोनों पक्ष एक दुसरे के विचारों की स्वतंत्रता को स्वीकार ही नहीं करते है।

प्रेम शब्द की व्याख्या अनन्त है। 

अपनी शिक्षा से प्रेम करो, कुटुंब से प्रेम करो, खुद से तो प्रेम करो ,सबसे ज्यादा जरुरत है खुद से प्रेम करने की, इसके अभाव में वर्त्तमान समय में आत्महत्या की समस्या दिन व दिन बढ़ रही है।


आज प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई समस्या है। उदाहरण के लिए अपनी संतान का सुबह समय से न जागना, सही दिनचर्या का पालन न करना आदि माता-पिता को एक समस्या जैसा लगता है। सभी समस्याओं का निवारण भी सूर्य के पास ही है।कालपुरुष की कुण्डली में छठा भाव समस्या या संघर्षों को बताता है और हम जानते हैं कि हर स्थान से बाहरवां स्थान उस स्थान की हानि करता है। अतः छठे स्थान से बाहरवां होता है पत्रिका का पंचम स्थान और पंचम स्थान में कालपुरुष के अनुसार सूर्य की सिंह को स्वामित्व दिया गया है, यानि आपकी और मेरी सभी समस्याओं का निवारण सूर्य के ही पास है। 


सबसे गहन मित्र हूँ मैं ।

आपकी आत्मा का चरित्र हूँ मैं।।


सूर्य को मित्र भी कहते हैं। सूर्य के जप का मंत्र है-

।।ऊँ मित्राय नमः।। 


सूर्य को ही मित्र कयों कहा गया और क्यों पंचमस्थान का स्वामित्व सूर्य को दिया गया? क्योंकि कालपुरूष की पत्रिका के अनुसार ज्ञान ही व्यक्ति  का सच्चा मित्र होता है।


कर्म का रुपान्तरण हूँ मैं।

सफल जीवन का कारण हूँ मैं।।


अष्टम भाव ट्रांसफॉर्मेशन यानि बदलाव को दर्शाता है। बदलाव अच्छा या बुरा हो सकता है। दशम का बदलाव दशम स्थान से अष्टम यानि पंचम स्थान बताता है। 

बड़ी-बड़ी कंपनी अपने यहाँ नौकरी देने से पहले कर्मचारियों के बुद्धि बल, सहनशक्ति और विपरीत परिस्थिति में कार्य करने की क्षमता को देखती है। पंचम भाव में स्थित सिंह राशि और इसके स्वामी सूर्य के अंदर ये सभी गुण होते है। यही भाव आपके कर्म में अनुकूल और प्रतिकूल बदलाव कर सकता है। इससे एक बात तो स्पष्ट होती है कि आप अपने कर्म में अनुकूलता या प्रतिकूलता के लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं। 

सफलता भी रातों-रात इंसान को मिल सकती है अगर मनुष्य पूरी निष्ठा, आत्मविश्वास, सहनशक्ति एवं धैर्य से निरन्तर प्रयास करता रहे। कर्म में स्थिरता, तरक्की चाहिए तो स्वयं को बदलें। नित्य नए-नए उपाय करने से नौकरी में तरक्की नहीं मिलेगी। 


शरणदाता हूँ मैं।

आपका भागयविधाता हूँ मैं।।


सूर्य के अनेक नामों में शरण्य भी एक नाम है यानि शरण देने वाला, इस प्रकार सूर्य शरण देने वाला यानि मदद करने वाला भी है। राजा ही हमेशा से प्रजा का रक्षक या सहारा देने वाला होता है। सूर्य पिता भी है और पिता आपके भाग्य विधाता होते है इसलिए पिता को पत्रिका के नवम भाव से देखा जाता है। दूसरों की सहायता करना, जरुरत पड़ने पर पीछे न हटना यही सूर्य हमें सिखाता है। सूर्य को समझना है तो सूर्य से सीखना भी होगा। 


एक सकारात्मक दृष्टिकोण हूं मैं।

इसलिए मान और सम्मान हूँ मैं।।


सूर्य सकारात्मक दृष्टिकोण भी है। आत्मविश्वास से हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक होता है। आत्मविश्वास एक ऐसी ताकत है जो विपरीत परिस्थिति में भी मनुष्य को सहारा देती है। कोई भी परेशानी होने पर घर का मुखिया सभी को सँभालते हुए अचानक आई विपत्ति से पार निकालने की राह को भी खोजता है और इसी कारण उसे मान-सम्मान भी प्राप्त होता है। सकारात्मक सलाह के लिए आजकल लोग कितना धन भी खर्च कर रहे हैं  सकारात्मक दृष्टिकोण समस्याओं को सुलझाने का एक विवेकपूर्ण तरीका है और ये कालपुरुष की पत्रिका में निहीत है। 


आपके नेत्र हूँ मैं

बंद आँखो से भी दिखे ऐसा क्षेत्र हूँ मैं।।


सूर्य को ज्योतिष में नेत्र कहा गया है लेकिन बंद आखों से भी जो दिखाई दे, ऐसा दूर तक फैला हुआ क्षेत्र भी सूर्य ही है। ज्ञान रुपी नेत्र से दिखने वाला क्षेत्र भी सूर्य ही है। इसलिए जब भी आप ध्यान करते है न जाने कहाँ-कहाँ पहुँच जाते है। ध्यान विचारों को स्थिर कर देता है या यूँ कहें कि विचारों की स्थिरता से ध्यान संभव होता है। 


बादलों को चीर कर निकली धुप हूँ मैं। 

आपका सबसे सूंदर रूप हूँ मैं।।


बादल भ्रम का प्रतीक है। आकाश में बादल होने पर कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखाई देता लेकिन ज्ञान एक ऐसा प्रकाश है जो इस भ्रम रुपी बादल को चीर कर चहूँ ओर उजाला कर देता है। ये उजाला सूर्य से ही है इसलिए कालपुरुष के पंचम स्थान में सूर्य को स्वामित्व दिया गया है। 

आप जब अपनी संतान को देखते हैं तो यही शब्द आपके मुख से निकलते है मेरी संतान बिलकुल मेरी तरह है। आपकी संतान आपका ही रूप है इसलिए सबसे सूंदर स्वरुप है। संतान की बात भी सूर्य से ही की जानी चाहिए क्योंकि पंचम का स्वामित्व कालपुरूष की पत्रिका में सूर्य को ही प्राप्त है।


नींद का संघर्ष हूँ मैं। 

नित्य दिया गया परामर्श हूँ मैं।।


नींद की बात पत्रिका के द्वादश भाव से होती है। द्वादश स्थान से छठा अर्थात पंचम स्थान नींद के संघर्ष को बताता है। आपने अक्सर सुना होगा की चिकित्सक या बड़े लोग और आजकल तो सभी यही कहते है की रात को हल्का और सात्विक भोजन करो ताकि अच्छी नींद आ सके। भोजन की बात पत्रिका के दुसरे स्थान से होती है लेकिन भोजन का सुख तो पत्रिका का पंचम स्थान ही बताता है। कालपुरुष के पंचम स्थान में सिंह राशि होती है जो सतोगुणी राशि है। इसलिए नींद के संघर्ष से बचना है और अच्छी नींद लेनी है तो स्वयं पर नियंत्रण रखें और समय के पाबंद बने। सूर्य ज्ञान है, परामर्श वही व्यक्ति दे सकता है जो विवेकी, ज्ञानी, धैर्यवान हो। 


पूर्वार्जित कर्म हूँ मैं।

जीवन का सबसे बड़ा धर्म हूँ मैं।।


पूर्वार्जित कर्मों की बात पंचम स्थान से होती है और सूर्य को कालपुरुष में पंचम स्थान का स्वामित्व प्राप्त है। पूर्वार्जित कर्म हमारे ही जन्मों-जन्मों के कर्मों का हिस्सा होता है और किसी न किसी रूप में हमारे वर्त्तमान कर्मों को प्रभावित करता है। वर्त्तमान कर्म पत्रिका का दशम भाव बताता है और पंचम स्थान दशम भाव से अष्टम होता है अर्थात दशम का रहस्य पत्रिका के पंचम भाव में ही छिपा है।  दशम भाव यानि वर्त्तमान कर्म का रहस्य हमारे पूर्वार्जित कर्मों पर ही आधारित  है। फिर क्यों आप बात-बात पर अपने बुरे समय के लिए दूसरो को दोष देते हैं। दोष देना छोड़ दंे और अपने कर्मों पर ध्यान दें क्योंकि कर्म करना ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। 


सभी इन्द्रियों का स्वामी हूँ मैं।

तभी तो परमज्ञानी हूँ मैं।।


सूर्य देव का एक नाम हृषिकेश भी है जिसका अर्थ होता है इन्द्रियों का स्वामी अर्थात इन्द्रियों को वश में करने वाला। 


गीता के तीसरे अध्याय के 42 वे श्लोक में कहा गया है कि- 


इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रयेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।


इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ हैं और इन्द्रियों से श्रेष्ठ होता है मन, मन से श्रेष्ठ होती है, बुद्धि और आत्मा बुद्धि से भी परे है।


इससे पूर्व के 41 वे श्लोक में कृष्णा कहते है कि-


तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।


हे भरतश्रेष्ठ! प्रारम्भ में ही इन्द्रियों को वश में करो और इस काम नामक शत्रु का वध करो, जो पाप का स्वरूप है तथा ज्ञान और साक्षात्कार को नष्ट कर देता है।


उपरोक्त श्लोको के माध्यम से कालपुरुष को ध्यान में रखते हुए हमे यही सीख मिलती है कि इन्द्रियों को केवल ज्ञान और विवेक के माध्यम से ही वश में किया जा सकता है। सूर्य आत्मा है और आत्मा शरीर से परे है आत्मा पर इन्द्रियों का भी प्रभाव नहीं होता है इसलिए मनुष्य का आत्म साक्षात्कार होना यानि स्वयं का बोध होना बहुत जरुरी है। कितनी गहराई है कालपुरुष में, बस हमें कुछ ओर अध्यन्न ही आवश्यकता है। 


सागर रूपी गहरे ज्ञान का मंथन हूँ मैं।

एक प्रभावशाली कथन हूँ मैं।।


किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए कर्म करना आवश्यक होता है। गहरा सागर अर्थात पत्रिका का अष्टम भाव जिसमें न जाने कितने रहस्य छिपे है। अगर हम इस रहस्य को खोजना चाहते हैं तो इसके लिए कर्म तो करना ही होगा। ध्यान से देखें कालपुरुष की पत्रिका को और धीरपूर्वक समझें की पंचम स्थान, अष्टम स्थान से दशम होता है अर्थात गहरे सागर में मोती ढूढ़ने के लिए किया गया प्रयास पंचम से ही प्रारम्भ होता है। इसलिए ज्ञान का बीज आज से ही बोना प्रारम्भ कर दें। प्रभावशाली कथन के लिए विवेक की आवश्यक्ता होती है और विवेक भी तो पंचम से ही जाना जाता है और सूर्य इसके स्वामी होते हैं। 


मैं उम्मीद करती हूँ कि सूर्य को समझने में अब आगे आपलोगों को कोई परेशानी नहीं होगी।


Meenu Singh Sirohi

7534086728/9911189051

Jan 2

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Comments (1)

Vedpra Singh
Jan 02

Gyan ho to Kalyan Ho aaj is Shabd ka Arth samajh aaya grahon ke Raja Surya ko bahut acche se unke gun Swarup ko samjhaya asha hi nahin purn Vishwas hai aapke agale paath mein Kisi Anya grah ka sakshatkar Ho Charan Sparsh guruji (Vedprakash Singh )

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Jyotishacharya Sharwan Kumar Jha

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