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होली रिश्तों में भरोसे की जीत और भय के नाश का त्यहार है।

Mar 5, 2025

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इसको हम कहानी के माध्यम से भी समझ सकते है जो होली से जुडी हुई है। एक असुर राजा हिरण्यकश्यप चाहता था कि हर कोई उसकी पूजा करे। लेकिन उसका बेटा प्रह्लाद भगवान नारायण का भक्त था। इस बात से पिता खुश नहीं थे हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग में नहीं जलने का वरदान प्राप्त होने के कारण हिरण्यकश्यप के कहने से विष्णुभक्त प्रहलाद को गोद में लेकर आग में प्रवेश कर गयी ताकि प्रहलाद आग में जल जाए लेकिन विष्णु की कृपा से ऐसा नहीं हुआ और होलिका ही जल कर भस्म हो गयी और प्रहलाद बच गए।

प्रह्लाद का भरोसा अटल था।


यह घटना फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को घटित हुआ था। इसलिए पूर्णिमा के दिन हम सभी सनातनी लोग प्रतीकात्मक रूप से होलिका का दहन करते हैं और उसके दूसरे दिन हर्षोल्लास के साथ होली का त्योहार मनाते हैं। कई जगह यह त्योहार पूर्णिमा को ही मना लिया जाता है।


शिवपुराण के अनुसार, हिमालय की पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु कठोर तपस्या कर रहीं थीं और शिव भी तपस्या में लीन थे। इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ छिपा था कि ताड़कासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा होना था। इसी वजह से इंद्र आदि देवताओं ने कामदेव को शिवजी की तपस्या भंग करने भेजा। भगवान शिव की समाधि को भंग करने के लिए कामदेव ने शिव पर अपने श्पुष्पश् वाण से प्रहार किया था। उस वाण से शिव के मन में प्रेम और काम का संचार होने के कारण उनकी समाधि भंग हो गई।इससे क्रुद्ध होकर शिवजी ने अपना तीसरा नेत्र खोल कामदेव को भस्म कर दिया। शिवजी की तपस्या भंग होने के बाद देवताओं ने शिवजी को पार्वती से विवाह के लिए राज़ी कर लिया। कामदेव की पत्नी रति को अपने पति के पुनर्जीवन का वरदान और शिवजी का पार्वती से विवाह का प्रस्ताव स्वीकार करने की खुशी में देवताओं ने इस दिन को उत्सव की तरह मनाया यह दिन फाल्गुन पूर्णिमा का ही दिन था। इस प्रसंग के आधार पर काम की भावना को प्रतीकात्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

यह उत्सव विशेष रूप से तमिलनाडु में मनाया जाता है

Mar 5, 2025

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Jyotishacharya Sharwan Kumar Jha

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